विडंगादि चूर्ण के फायदे उपयोग घटक सेवन विधि
विडंगादि चूर्ण के फायदे उपयोग घटक सेवन विधि
पिबेत् तक्रेण सम्पिष्य सर्वक्रिमिनिवृत्तये ॥
दीपनं ग्राहि कफवातहरं बल्यं रसायनम् ॥
विडंगादि चूर्ण के फायदे/लाभ
- त्रिदोष -वात, कफ पित्त को संतुलित करने के के लिए विडंगादि चूर्ण अत्यंत लाभकारी होता है। यह तीनों गुणों को बेलेन्स करता है।
- पेट के कीड़ों / कृमि को दूर करने के लिए विडंगादि चूर्ण विशेष महत्त्व रखता है। विडंगादि चूर्ण में कृमिनाशक (anti-parasitic) गुण होते हैं। कृमिनाशक गुणों के कारण ही इसका उपयोग पेट के कीड़े दूर करने के लिए किया जाता है। इसके उपयोग से आंतो के आंतों के पैरासाइट्स दूर होते हैं।
- इस चूर्ण के उपयोग से पाचन क्रिया में सुधार होता है और यह कमजोर पाचन (Mandagni) को ठीक करता है, जो पेट के कीड़ों के पनपने का कारण होता है, और अपच व पेट फूलने जैसी समस्याओं में राहत देता है.
- पाचन को दुरुस्त कर यह कब्ज दूर करने, शारीरिक शक्ति बढ़ाने और वजन नियंत्रण में भी सहायक हो सकता है, क्योंकि इसमें एंटीऑक्सीडेंट और चयापचय-सुधार गुण होते हैं.
- पाचन को सुधारकर पेट दर्द करने में यह चूर्ण लाभकारी है।
- विडंगादि चूर्ण वजन कम करने में भी उपयोगी है चूँकि यह कोलेस्ट्रॉल स्तर को कम करके और शरीर की चर्बी को दूर करता है।
- विडंगादि चूर्ण में एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं शरीर को फ्री रेडिकल्स से बचाते हैं।
- डायबिटिक कार्बंकल और ट्यूबरकुलर ग्लैंड्स के उपचार में प्रभावी।
- त्वचा शुद्धि और पुनर्जीवन में सहायक।
- वात संतुलन से डिप्रेशन कम करने में यह चूर्ण उपयोगी है।
- जिन लोगों को भूख (भूख बढाने के चूर्ण ) नहीं लगती है उनके लिए इस चूर्ण के सेवन से भूख में वृद्धि होती है।
- इसके उपयोग से मेटाबॉलिज्म में सुधार होता है और यह चूर्ण बढ़ते वजन को नियंत्रित करने में सहायक है .
विडंगादि चूर्ण संदर्भ और पारंपरिक उपयोग
सुश्रुत संहिता ग्रन्थ में विडंग कृमिनाशक गुण का वर्णन मिलता है। केरल और तमिल आयुर्वेदिक परंपराओं ने इसके फॉर्मूले को परिष्कृत किया, अदरक-काली मिर्च मिलाकर शक्ति बढ़ाई। रस तरंगिणी जैसे ग्रंथों में वर्षा ऋतु में पाचन सुधार हेतु दैनिक सेवन की सलाह दी गई। पूर्व में वैद्य सैनिकों को आंतों संक्रमण से बचाने हेतु देते थे।विडंगादि चूर्ण के घटक
- विडंग (Vidanga) Embelia ribes
- सैंधव लवण (Rock Salt) Halite
- यवक्षार (Barley Ash) Hordeum vulgare ash
- कंपिल्लक/कबीला Mallotus philippensis
- हरीतकी (Haritaki) Terminalia chebula
विडंग/बायविडंग (Vidanga) – Embelia ribes
- आँतों के कीड़े (राउण्डवर्म, हुकवर्म आदि) नष्ट करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
- विडंग का उपयोग भूख बढ़ाने, गैस, अफारा और मंदाग्नि को कम करने में सहायक।
- स्वांस नाली के संक्रमण को दूर कर कफ समाप्त करने के लिए उपयोगी है।
- आयुर्वेदिक योगों में रक्तशर्करा व वज़न नियंत्रण के लिए विडंग का उपयोग किया जाता है।
- चर्म रोग : विडंग का उपयोग चर्म रोगों को दूर करने के लिए बाह्य और चूर्ण रूप में किया जाता है।
- बिच्छू के काटने तथा सर्प दंश के प्रभावों को दूर करने के लिए विडंग का उपयोग आयुर्वेद में किया जाता है।बायविडंग का उपयोग खून साफ करने के लिए होता है।
पुंसि क्लीबे विडङ्गः स्यात्कृमिघ्नो जन्तुनाशनः ।
तण्डुलश्च तथा वेल्लममोघा चित्रतण्डुलः ॥१११॥
विडङ्ग कटु तीक्ष्णोष्णं रूक्षं वह्निकरं लघु ।
शूलाध्मानोदरश्लेष्मकृमिवातविबन्धनुत् ॥११२॥
सैंधव लवण (Sendha Namak / Rock Salt) – Halite
- सेंधा नमन वात पित्त को संतुलित करता है। यह तीक्ष्ण और सुपाच्य है।आयुर्वेद में सेंधा नमक को अन्य नमक की तुलना में श्रेष्ठ माना जाता है।
- अग्नि को हल्का उत्तेजित कर के भूख व पाचन में सुधार में उपयोग; गैस व भारीपन में लाभकारी है।
- प्राकृतिक खनिजों के कारण शरीर के जल-नमक संतुलन में सहायक।
- श्वसन मार्ग की सफाई, कफ कम करने तथा गले की खराश में गरारा/काढ़े में उपयोग में लिया जाता है।
- सेंधा नमक पोटैशियम, कैल्शियम, आयरन जैसे कई खनिजों से भरपूर होता है और आयुर्वेद में इसे शुद्ध व स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है।
- सेंधा नमन स्वाद में नमकीन, हल्का मीठा, तासीर –ठंडी , गुण – हल्का होता है.
- सेंधा नमक का उपयोग गठिया के दर्द और हर्पीज से राहत, कीड़े के काटने से होने वाली सूजन और जलन को दूर करने के लिए किया जाता है।
- सेंधा नमक के उपयोग से सेरोटोनिन और मेलाटोनिन हार्मोन्स बैलेंस्ड रहता है जिससे तनाव कम होता है।
- सेंधा नमक में सोडियम और पोटैशियम होने के कारण यह पाचन को बढाता है।
- सेंधा नमक में डिकंजेस्टेंट गुण होते हैं, जिसके कारण से गुनगुने पानी से गरारे करने पर गले की खरांश दूर होती है।
- आयुर्वेद में सिरदर्द (सिरदर्द दूर करने के उपाय ) और माइग्रेन विकारों के लिए सेंधा नमक/हिमालयन सॉल्ट को उपयोगी माना गया है।
यवक्षार (Yavakshara – Barley Ash) – Hordeum vulgare ash
- तीक्ष्ण व क्षार गुण के कारण जमा हुआ कफ व आम दूर करने के लिए लिए गुणकारी है।
- कण्ठविकार व मूत्रविकारों में गुणकारी।
- अपच, गैस, खट्टे डकार, पेट भारीपन को दूर करने में उपयोगी है।
- मूत्रकृच्छ्र (दर्द व जलन के साथ मूत्र), पथरी के प्रबंधन के कुछ आयुर्वेदिक सूत्रों में यवक्षार का उपयोग किया जाता है।
- क्षार होने के कारण अधिक अम्लता का शमन करने में परंपरागत रूप से उपयोग।
- कुछ योगों में चर्बी गलाने व मार्ग शोधन के समर्थन के लिए अन्य द्रव्यों के साथ प्रयोग।
कंपिल्लक / कबीला – Mallotus philippensis
- फोड़े-फुंसी, खुजली, दाद जैसे त्वचा रोगों में पारंपरिक उपयोग, रक्तदूषित अवस्थाओं में लाभकारी है।
- आँतों के परजीवी व कृमि विकारों को दूर करने के लिए उपयोग में लिया जाता है।
- कुछ सूत्रों में यकृत विकार व पीलिया के समर्थन हेतु अन्य द्रव्यों के साथ प्रयोग का वर्णन।
- त्वचा पर लेप/उबटन में, विशेषतः खुजली व संक्रमण दूर करने के लिए उपयोग में लिया जाता है।
- मल को नरम कर कब्ज में सहायक है।
हरीतकी (Haritaki) – Terminalia chebula
- वातहर, सभी दोषों को संतुलित करने वाली प्रमुख रसायन औषधि।
- कब्ज, पेट भारीपन, गैस व आमपाचन में अत्यंत प्रसिद्ध, मल विकार दूर करने के लिए ।
- दीर्घकालिक उपयोग से ओज, बल, आयु व रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का वर्णन; “अभय” नाम से भी प्रसिद्ध।
- नेत्रज्योति, स्वर-शुद्धि तथा हृदय-स्वास्थ्य के समर्थन में आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसका उपयोग बताया गया।
- त्रिफला आदि योगों के रूप में वज़न कम करने, रक्तशर्करा संतुलन व त्वचा-शुद्धि में उपयोग।
- कफ-प्रकृति के खांसी, दमा आदि में अन्य द्रव्यों के साथ उपयोग।
विडंगादि चूर्ण सेवन विधि
विडंगादि चूर्ण के दुष्प्रभाव
विडंगादि चूर्ण बनाने की विधि
विडंगं सैंधवं यवक्षारं कंपिल्लकं हरितकी तथा।समानक्वाथं चूर्णयेत् कृमिघ्नं विडंगादि चूर्णकम्॥
विडंगादी चूर्ण की निर्माण विधि आयुर्वेदिक ग्रंथों जैसे भावप्रकाश और चरक संहिता पर आधारित औषधीय चूर्ण है। इसके लिए आप सभी घटक को सामान मात्रा में लें और निम्न चरणों का पालन करें।
- विडंग (Embelia ribes) फल – 100 ग्राम
- सैंधव लवण (Rock Salt) – 100 ग्राम
- यवक्षार (Hordeum vulgare ash) – 100 ग्राम
- कंपिल्लक/कबीला (Mallotus philippensis) – 100 ग्राम
- हरीतकी (Terminalia chebula) – 100 ग्राम
सभी द्रव्यों को शुद्ध स्रोत से लें। विडंग, कंपिल्लक और हरीतकी को धोकर छाया में सुखाएं। सैंधव लवण को भून लें। यवक्षार पहले से तैयार कर लें। प्रत्येक द्रव्य को अलग-अलग खरल (मोर्टार) में बारीक पीसें या मिक्सर में चूर्ण बनाएं। सभी चूर्णों को साफ वस्त्र से छानकर समान अनुपात में मिलाएं।
