स्वर्ण भस्म फायदे नुकसान सेवन विधि
स्वर्ण भस्म फायदे नुकसान सेवन विधि
भस्म निश्चूर्णन (calcination)द्वारा प्राप्त होता है जिसमे धातु या खनिज प्रदार्थ को राख में बदला जाता है और उसके औषधीय गुणों का लाभ प्राप्त किया जाता है। स्वर्ण भस्म में 28-35 नैनोमीटर के क्रिसटलीय कण होते हैं जो कि 90 % w/w शुद्ध सोने के कण होते हैं।
इसका कामोत्तेजक असर सहनशक्ति, ताकत, शुक्राणु की कमी और वीर्य की गुण-मात्रा सुधारने में मदद करता है। ब्रोंकियल अस्थमा, गठिया, मधुमेह व तंत्रिका समस्याओं के अलावा यह बेहतरीन हृदय टॉनिक है, जो कमजोरी, ब्लड प्रेशर और हृदय गति को सुधारता है। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, एंटीऑक्सीडेंट व एंटी-एजिंग गुणों के कारण प्रसिद्द ओषधि है। स्वर्ण भष्म का प्रधान उपयोग बांझपन दूर करने, गठिया, अस्थमा, त्वचा विकार टीबी आदि विकारों के इलाज के लिए किया जाता है।
- सल्फर – 3.3% w/w
- कैल्शियम – 1.6% w/w
- सोडियम – 0.9% w/w
- पोटैशियम – 0.4% w/w
- कॉपर – 17.2% w/w
- फेरिक ऑक्साइड – 85% w/w
- फेरस ऑक्साइड – 5.7% w/w
- आयरन – 36 से 52% w/w तक
- फॉस्फेट – 1.1% w/w
- अघुलनशील अम्ल – 3.8% w/w
- सिलिका – 3.8% w/w
स्वर्ण भस्म के फायदे/लाभ
स्वर्ण भस्म के आयुर्वेद में विस्तार से गुण, कर्म, प्रभाव आदि पर वर्णन प्राप्त होता है, आइये इसके प्रमुख लाभ /फायदों के विषय में जान लेते हैं।स्वर्ण भस्म रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में लाभकारी
स्वर्ण भस्म विषाक्त प्रदार्थों को शरीर से बाहर निकालने में सहयोगी है और रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ाने में उपयोगी है। शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के बेहतर होने से संक्रमण से बचाव होता है और हर दृष्टि से स्वास्थ्य में सुधार आता है। इसका प्रभाव शरीर के सभी अंगों पर होता है और बीमारियों से बचने की शक्ति प्राप्त होती है। यह इंफ्लेमेशन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को दूर करती है।मानसिक स्वास्थ्य के लिए स्वर्ण भस्म के फायदे
स्वर्ण भस्म स्मृति लोप को दूर कर स्मृति में वृद्धि में सहायक है और इसके अतिरिक्त स्वर्ण भस्म एकाग्रता, स्थिरता को बढ़ाती है। अवसाद और तनाव को दूर करने में लाभकारी है।स्मरण शक्ति की वृद्धि के लिए
उम्र के बढ़ने के साथ साथ स्मरण शक्ति भी कमजोर होने लगती है, आयुर्वेद के अनुसार ऐसा कफ की निष्क्रियता या वात दोष के बढ़ने के कारण होता है। स्वर्ण भस्म रसायन की भाँती कार्य करता है जिससे स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है।गठिया विकार में उपयोगी
रूमेटॉइड आर्थराइटिस, गठिया विकार में स्वर्ण भस्म उपयोगी औषध है। आमवात में वात दोष होने के कारण जोड़ों में दर्द के विकार होते हैं। पाचन अग्नि के कमजोर होने से शरीर में आम जमा होने लगता है। स्वर्ण भस्म रसायन की तरह से कार्य करके शरीर से आम (विषाक्त प्रदार्थ ) को बाहर निकालता है। स्वर्ण भस्म संधिवात, गठिया रोग, आर्थराइटिस, सायटिका तथा मांसपेशियों की दुर्बलता जैसी व्याधियों में जोड़ों के दर्द को शांत करती है। रसायन गुणों से युक्त यह ऊतकों को पुनर्जनन कर शारीरिक गतिशीलता विकास बढ़ाती है। त्रिदोष नाशक गुणों के कारण यह वातजन्य जकड़न, पित्त की तीव्रता तथा कफ संचय को दूर करती है। नियमित सेवन से शरीर का ओज बढ़ता है तथा दीर्घकालिक जोड़ स्वास्थ्य सुनिश्चित होता है।हृदय के लिए स्वर्ण भस्म के उपयोग
हृदय के विकारों के समाधान के लिए स्वर्ण भस्म का उपयोग होता है। स्वर्ण भस्म के उपयोग से रक्त प्रवाह सुचारु होता है और हृदय की मांसपेशिया मजबूत होती हैं।भूख वृद्धि के लिए
अग्निमांद्य के कारण भोजन से अरुचि होती है। स्वर्ण भस्म पाचन क्रिया को दुरुस्त करने में लाभकारी है, यह भूख की कमी, प्यास, पेट फूलना जैसे विकारों को दूर करती है।तनाव दूर करने में लाभकारी
गोल्ड भस्म बेनिफिट्स नेत्र ज्योति के लिए
आयुर्वेद शास्त्र में स्वर्ण भस्म को नेत्र रोगों के उपचार में विशेष रूप से उपयोगी माना गया है, जो आंखों की विविध परेशानियों से राहत दिलाने में सहायक होती है। यह आंखों की कमजोरी दूर करने के साथ-साथ संक्रमण और सूजन को नियंत्रित करने में भी लाभदायक सिद्ध होती है। स्वर्ण भस्म आंखों के लाल होने, खुजली, जलन और पानी आने जैसी कंजंक्टिवाइटिस की समस्याओं को कम करने में प्रभावी है। प्रवाल पिष्टी, मुक्ता पिष्टी और गिलोय सत्व के संयोजन से इसका सेवन नेत्र श्लेष्मा की सूजन घटाता है तथा रोगाणुओं से लड़ने की क्षमता बढ़ाता है।यह आंखों की थकान, धुंधलापन और पलकों की सूजन जैसी स्थितियों में भी राहत प्रदान करती है। पुनर्नवा भस्म के साथ मिलाकर लेने पर यह दृष्टि शक्ति को मजबूत बनाती है तथा दीर्घकालिक नेत्र स्वास्थ्य सुधारने में मददगार साबित होती है।
स्वर्ण भस्म का उपयोग कैंसर से बचाव के लिए
स्वर्ण भस्म ट्यूमर कोशिकाओं के अनियंत्रित विकास को रोकने में सहायता करती है, विशेषकर जब इसे अश्वगंधा चूर्ण या कांचनार गुग्गुल के साथ संयोजित किया जाता है। यह विषाक्त पदार्थों को नष्ट करने वाली क्षमता के कारण कैंसरजन्य परिवर्तनों को सीमित करती है तथा कोशिका मृत्यु प्रक्रिया को संतुलित रखती है। इसमें उपस्थित सूक्ष्म कण रक्त को शुद्ध करते हैं तथा हानिकारक जीवाणुओं व विषैले तत्वों से शरीर की रक्षा करते हैं। नियमित सेवन से समग्र ओज बढ़ता है, जिससे गंभीर संक्रमणों की संभावना न्यून हो जाती है।स्वस्थ त्वचा के लिए स्वर्ण भस्म के फायदे
आयुर्वेदिक चिकित्सा में स्वर्ण भस्म को त्वचा के स्वास्थ्य को बढ़ाने वाली औषधि माना जाता है, जो रंग निखारने और सौंदर्य बढाने में विशेष लाभ प्रदान करती है। यह त्वचा को स्वस्थ चमक देती है तथा उम्र संबंधी लक्षणों को रोकने में सहायक सिद्ध होती है।
स्वर्ण भस्म पूरे शरीर का नवीनीकरण करती है, झुर्रियों को घटाती है तथा समय से पूर्व बालों के भूरा होने की प्रक्रिया को नियंत्रित रखती है। कोलेजन निर्माण बढ़ाकर त्वचा की लचीलापन बनाए रखती है तथा दीर्घकालिक सौंदर्य विकास सुनिश्चित करती है।
यौन शक्ति के विकास के लिए गुणकारी
आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में स्वर्ण भस्म पुरुषों के यौन स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए विशेष महत्वपूर्ण औषधि है, जो विविध कमजोरियों को दूर करने में सहायक सिद्ध होती है। यह शारीरिक बल बढ़ाती है तथा संपूर्ण प्रजनन तंत्र को पोषण प्रदान करती है। स्वर्ण भस्म पुरुषों में स्तंभन निष्क्रियता और शीघ्र स्खलन जैसी व्याधियों को नियंत्रित करती है। अश्वगंधा चूर्ण या कौंच बीज के साथ संयोजन से वीर्य की गुणवत्ता सुधरती है तथा शुक्राणु संख्या में विकास आता है।यह कामोद्दीपक गुणों से युक्त होकर यौन इच्छा बढ़ाती है तथा सेक्स कालावधि को लंबा करने में लाभदायक सिद्ध होती है। महिलाओं व पुरुषों दोनों में बांझपन समस्या को संबोधित करती है तथा सिफलिस जैसे संक्रामक रोगों के उपचार में सहयोगी भूमिका निभाती है।
स्वर्ण भस्म गर्भावस्था में गुणकारी
गर्भावस्था में महिलाओं में उल्टी, मतली और मांसपेशियों की कमजोरी जैसी परेशानियां स्वर्ण भस्म के सेवन से कम हो सकती हैं, क्योंकि यह पाचन तंत्र को दुरुस्त करती है । यह ओज बढ़ाने वाली गुणों से युक्त होकर प्रसवोत्तर कमजोरी दूर करने में लाभदायक सिद्ध होती है।आयुर्वेदिक ग्रंथों में स्वर्ण भस्म का सेवन उम्र, प्रकृति और रोग के अनुसार निर्धारित किया जाता है, क्योंकि यह धातु औषधि होने से संतुलित मात्रा में ही शरीर के लिए लाभकारी सिद्ध होती है। बिना वैद्य परामर्श या अनुचित संयोजन के इसका उपभोग स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
विभिन्न आयु वर्गों के लिए खुराक
- शिशुओं व 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों को प्रतिदिन 5 मिलीग्राम तक सेवन कराया जा सकता है।
- 5 से 10 वर्ष के बालकों के लिए दैनिक 10 मिलीग्राम मात्रा उपयुक्त रहती है।
- 10 से 16 वर्ष के किशोरों हेतु 15 मिलीग्राम प्रतिदिन निर्धारित है।
- वयस्कों के लिए सामान्यतः 15-30 मिलीग्राम प्रतिदिन, अधिकतम 62.5 मिलीग्राम तक अनुशंसित होती है।
मधुमेह, यौन कमजोरी, शुक्राणु संख्या विकास या बांझपन उपचार में 2 माह तक नियमित सेवन लाभदायक सिद्ध होता है, जबकि गंभीर व्याधियों में अधिकतम 9 माह तक विस्तार संभव है। दिन में दो बार, भोजनोत्तर सुबह-शाम ग्रहण करें।
अनुपान व सावधानियां
दूध, घृत या शहद के साथ इसका सेवन प्रभाव बढ़ाता है, किंतु बेल फल के साथ वर्जित है। युक्त औषधियों के रूप में भी प्रयोज्य, परंतु सदैव आयुर्वेदिक चिकित्सक की देखरेख में ही उपयोग करें।पाचन शक्ति के विकास के लिए
स्वर्ण भस्म अम्लपित्त, अपच, कब्ज, गैस, अल्सर, यकृत दुर्बलता तथा उदर शूल जैसी समस्याओं को शांत करती है। यह मंदाग्नि को दूर कर पाचन क्रिया को सुचारू बनाती है तथा विषाक्त पदार्थों का निष्कासन बढ़ावा देती है। इसके सेवन से शरीर का मेटाबॉलिज्म सुधरता है, जिससे ऊर्जा निर्माण बढ़ता है और शारीरिक बल में वृद्धि होती है। नियमित उपयोग से पोषण संबंधी कमियां दूर हो जाती हैं।शरीर को युवा बनाए रखने और ऊर्जा बढ़ाने में सहायक
स्वर्ण भस्म झुर्रियों को कम करती है, त्वचा की लचक बनाए रखती है तथा समय से पूर्व बाल सफेदी रोकती है। एंटीऑक्सीडेंट गुणों से मुक्त कणों का प्रभाव सीमित कर कोलेजन निर्माण को प्रोत्साहित करती है। नियमित सेवन से शरीर की हर कोशिका सक्रिय हो उठती है, जिससे शारीरिक बल, मानसिक स्पष्टता और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। यह ओज को पुनर्स्थापित कर दीर्घायु सुनिश्चित करती है।एनीमिया और खून की कमी
स्वर्ण भस्म रक्त कोशिकाओं के पुनरुत्पादन को बल देती है तथा लौह तत्वों के अवशोषण को सुधारती है। यह शरीर में ऑक्सीजन संचरण को वृद्धि करती है।स्वर्ण भस्म के नुक्सान
- अधिक सेवन से पेट दर्द, आंतरिक सूजन, ऐंठन, शारीरिक दुर्बलता तथा थकान जैसी व्याधियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। यह अग्निमांद्य पैदा कर पोषण अवशोषण को बाधित करता है।
- यौन विकास हेतु लाभदायक होने पर भी अति प्रयोग पुरुषों में नपुंसकता उत्पन्न कर सकता है, क्योंकि यह वीर्य धातु पर संतुलन भंग करता है। लंबे काल तक अनियंत्रित सेवन शारीरिक ऊर्जा को क्षीण बनाता है।
- अनुशंसित 9 माह की अधिकतम अवधि से परे प्रयोग हानिकारक सिद्ध होता है। बच्चों की पहुँच से दूर रखें, क्योंकि अनजाने में सेवन नेत्र क्षति पहुँचा सकता है। बिना वैद्य परामर्श के कभी ग्रहण न करें।
दीर्घायुष्यम् रसायनं सर्वरोगप्रणाशनम्॥
सोना हृदय को हर्षित करता है, बल प्रदान करता है, वर्ण-तेज बढ़ाता है, दीर्घ जीवन देता है, रसायन है तथा समस्त रोगों का नाश करने वाला है। धातु वर्ग में स्वर्ण भस्म निर्माण विधि व रोगों में उपयोग वर्णित है, विशेषकर शल्य चिकित्सा व रक्तपित्त में। रस रत्न समुच्चय: भस्म निर्माण की 14 संस्कार प्रक्रिया का विवरण, जो शुद्धीकरण हेतु आवश्यक है। कश्यप संहिता: स्वर्णप्राशन घनिष्ठ विधि से शिशु विकास हेतु। चरक संहिता में स्वर्ण भस्म के विषय में कहा गया है की इसके नियमित सेवन से त्वचा में निखार, ऊर्जा में वृद्धि और यौन स्वास्थ्य में सुधार होता है।
स्वर्ण भस्म का उपयोग
- वातप्रकोप ज्वर में स्वर्ण भस्म-रससिंदूर को बेल छाल स्वरस के साथ दें।
- पित्तज्वर हेतु रससिंदूर युक्त स्वर्ण भस्म पित्तपापड़ा स्वरस सहित ग्रहण करें।
- सामान्य ज्वर में तुलसी पत्र स्वरस अनुपान से स्वर्ण भस्म-रससिंदूर योग दें।
- जीर्ण ज्वर के लिए स्वर्ण भस्म-अभ्रक भस्म शहद के साथ सेवन कराएं।
- पुरानी संग्रहणी में स्वर्ण भस्म, रसपर्पटी व शंख भस्म उचित अनुपान से लाभकारी। पुराने पांडु में गुग्गुल सत्व, स्वर्ण भस्म व लौह भस्म शहद सहित लें। राजयक्ष्मा हेतु स्वर्ण भस्म, अभ्रक भस्म, रससिंदूर व मुक्तापिष्टी शहद युक्त दें।
- श्वास व पाचन रोग योग-चरकोक्त श्वासहर योग में स्वर्ण भस्म को शुनठी चूर्ण आदि द्रव्यों सहित सेवन कराने पर भयंकर श्वास रोग नष्ट हो जाता है। नवीन या पुराने अम्लपित्त में स्वर्ण भस्म को आंवला चूर्ण में मिलाकर ग्रहण करने से पित्त संतुलन होता है।
- मिर्गी व कंपन नाशक-अपस्मार व योषापस्मार में स्वर्ण भस्म, रससिंदूर, अभ्रक भस्म व शंखपुष्पी चूर्ण का संयोजन शीघ्र लाभ देता है। शिरःकंप रोग हेतु स्वर्ण भस्म को बला क्वाथ अनुपान से सेवन कराएं।
- सूजन व कंठ सुधारक योग-अंडकोष सूजन में स्वर्ण भस्म, पारद-गंधक कज्जली व पुनर्नवा चूर्ण गोमूत्र सहित लेने पर सूजन मिट जाती है। कंठ स्वर सुधार हेतु स्वर्ण भस्म को मुनक्का, पिप्पली, कायफल व मुलेठी चूर्ण में मिलाकर कुछ दिनों सेवन करने से स्वर कोमल व सुरीला बनता है।
- सौंदर्य व त्रिदोष नाशक योग-स्त्रियों में सौंदर्य वृद्धि हेतु स्वर्ण भस्म को लाल चंदन, नागकेशर, कमलकेशर, नीलोफर, मुलेठी, खांड, मजीठ व केसर जैसे रक्तशोधक-रक्तवर्धक द्रव्यों सहित सेवन कराने पर रंगत निखरती है। त्रिदोषजन्य उन्माद रोग में स्वर्ण भस्म को सोंठ, लौंग व काली मिर्च चूर्ण में मिलाकर शहद अनुपान से लाभ होता है।
- मेधा शक्ति विकास-मेधा व धारणा शक्ति बढ़ाने हेतु स्वर्ण भस्म को वचा, गिलोय, सोंठ व शतावरी चूर्ण के साथ ६ मास निरंतर सेवन कराने पर स्मृति व बुद्धि में अद्भुत विकास आता है।
- बल व गर्भाशय विकास योग- कृश व्यक्तियों में शारीरिक बल हेतु स्वर्ण भस्म को शालपर्णी, विदारीकंद, अश्वगंधा व कांच बीज चूर्ण सहित तीन मास निरंतर सेवन कराने पर हृष्ट-पुष्टता प्राप्त होती है। गर्भाशय शक्ति बढ़ाने हेतु नागकेशर चूर्ण में स्वर्ण भस्म मिलाकर ऋतु काल में स्त्री को ग्रहण कराएं, जबकि शोथ उपद्रवों में शिलाजीत, लौह भस्म व चांदी भस्म युक्त स्वर्ण भस्म दशमूल कषाय से सेवन कराएं।
- जरा नाश व दाह निवारण-अकाल जरा प्रभाव दूर करने हेतु स्वर्ण भस्म को च्यवनप्राश, मकरध्वज व अभ्रक भस्म सहित सेवन लाभदायक है। दाह रोग में स्वर्ण भस्म (चौथाई रत्ती) व मोती पिष्टी (आधी रत्ती) आंवला मुरब्बा अनुपान से देने पर तीव्रता मंद पड़ती है।
- पित्त व ग्रहणी उपचार-पित्त प्रधान उन्माद में स्वर्ण भस्म (चौथाई रत्ती), अभ्रक भस्म (1 रत्ती), ब्राह्मी-वच चूर्ण (2-2 रत्ती) शहद सहित भोजनोत्तर सारस्वतारिष्ट व हिमकल्याण तेल मालिश से लाभ होता है। ग्रहणी में स्वर्ण भस्म (चौथाई रत्ती), सोंठ-भुना जीरा चूर्ण (2-2 रत्ती) मधु अनुपान से मृतप्राय रोगी भी पुनः स्वस्थ हो जाता है।



