सहदेवी परिचय उपयोग और फायदे

सहदेवी हर्ब का परिचय उपयोग और फायदे

सहदेवी (Sahdevi ) को देखने में लगता है जैसे कोई मामूली घास हो, जो मैदानी इलाकों में खाली जमीनों, सड़क किनारों और खेतों के आसपास हर जगह पाई जाती है, चूँकि यह खेतो में खरपतवार के साथ उगती है। 
 
आयुर्वेद में इसके पत्ते, मूल (जड़) और पुष्प को गुणकारी माना गया है। इस लेख में हम सहदेवी (Vernonia cinerea) का परिचय, उपयोग और इसके औषधीय गुणों के बारे में जानेंगे। 
 

आयुर्वेद में सहदेवी हर्ब को कफ-वात शामक, ज्वर और पाचन विकार नाशक, बल्य (ताकत देने वाली), रूचिकारक (भूख बढ़ाने वाली), वातानुलोमक, निद्राकारक, मूत्रकृच्छ्र, विषम ज्वर और सिद्धम नाशक गुणों से युक्त बताया गया है। आयुर्वेद में इसके गुण और प्रभाव तिक्त, उष्ण, लघु, रूक्ष तथा कफवातशामक हैं। सहदेवी को घरेलु रूप से पथरी के इलाज, मूत्र ना आने पर, और शरीर की सफाई के लिए, सरदर्द, पेट के कीड़ों को दूर करने के लिए उपयोग में लाया जाता है। इसके औषधीय गुण इसे किडनी और लीवर के लिए अधिक उपयोगी बनाते हैं। 
 
सहदेवी Asteraceae (ऐस्टरेसी) कुल का पादप है जिसका अंग्रेज़ी में नाम Fleabane (फ्लीबेन) है। इसे संस्कृत में सहदेवी, दण्डोत्पला, सहदेवा; हिन्दी-सहदेई आदि नामों से पहचाना जाता है। 

सहदेवी के फायदे

आइये सहदेवी के समस्त फायदों के विषय में विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं.

किडनी विकारों में सहदेवी के फायदे

सहदेवी, मूत्र विकारों में गुणकारी ओषधि है। पेशाब में जलन, पेशाब का ना आना, रुक रुक कर आना, आदि में इसके उपयोग लाभकारी हैं। किडनी में पथरी होने पर भी सहदेवी लाभकारी है। मूत्राशय को साफ़ करने और खुलकर मूत्र लाने में सहदेवी सहायक है। शरीर में जमा विषाक्त प्रदार्थों को निकालने में सहदेवी लाभकारी है, विषाक्त प्रदार्थों के शरीर से बाहर निकलने पर किडनी पर जोर कम पड़ता है और वह स्वस्थ बनी रहती है। सहदेवी के सेवन से मूत्र मार्ग संक्रमण (UTIs) और गुर्दे की पथरी को रोकने में मदद मिलती है। सहदेवी में बुफाडायनोलाइड्स और फ्लेवोनॉइड्स जैसे तत्व होते हैं जो सुजन को दूर करते हैं। शराब के सेवन से लीवर को क्षति होती है ऐसे में सहदेवी की ताजा पत्तियों को तोड़कर उनका रस निकाल लें और शहद के साथ इसे लेना चाहिये तो शीघ्र फायदा मिलता है। 
 

सूजनरोधी / एंटी-इंफ्लेमेटरी और दर्द निवारक गुण

सहदेवी सूजन और सूजन के कारण होने वाले दर्द को दूर करने में लाभकारी है। यह औषधीय पादप जोड़ों के दर्द और मांशपेशियों के दर्द को दूर करने में भी उपयोगी है।  
 

पाचन दुरुस्त करने और गेस्ट्रिक विकारों में लाभकारी 

सहदेवी का पादप पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है। यह पेट में आफरा, पेट का फूलना अपच अजीर्ण को दूर करने में लाभकारी है। सहदेवी पाचन एंजाइमों को उत्तेजित करती है, आंतों के स्वास्थ्य में सुधार करती है और पेट की तकलीफों में लाभकारी है। 

रोग प्रतिरोधक क्षमता के विकास में लाभकारी

शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता के विकास के लिए भी सहदेवी गुणकारी होती है। यह वायरल रोगों से लड़ने और संक्रमण से बचाव में लाभकारी है। 

आंतों के कीड़े दूर करने के लिए

सहदेवी के फूलों का क्वाथ बनाकर पीने से आँतों के कीड़े समाप्त होते हैं। इसके अतिरिक्त यह पाचन को भी दुरुस्त करता है।  

गठिया के लिए सहदेवी का उपयोग

गठिया विकार में सहदेवी के पुष्पों का और मूल को पीस कर एक लेप बना लें। इस लेप को जोड़ों यथा घुटनों पर लगाने से दर्द दूर होता है क्योंकि यह एंटी इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होता है। इससे सूजन दूर होती है।

सरदर्द और अनिंद्रा के लिए उपयोगी

सहदेवी की जड़ों का गाढ़ा पेस्ट आप अपने माथे पर लेप की तरह लगाने से सरदर्द दूर होता है और अनिंद्रा विकार में भी लाभकारी है। माइग्रेन में सहदेवी का विशेष लाभ होता है। 
 

प्रदर रोग में लाभ

प्रदर रोग से पीड़ित व्यक्ति को सहदेवी की मूल को 1 ग्राम की मात्रा में कल्क बनाकर बकरी के दूध के साथ सेवन कराएं। इससे प्रदर रोग धीरे-धीरे शांत हो जाता है।

श्लीपद के उपचार में

चिरकालीन श्लीपद रोग के लिए सहदेवी की मूल का कल्क हरताल के साथ मिलाकर प्रभावित स्थान पर लेप करें। रक्तचंदन को सहदेवी के साथ पीसकर लेप करने से भी श्लीपद में आराम मिलता है। इसके अलावा, सहदेवी के पत्तों का स्वरस तेल में उबालकर लेप लगाने से रोग का शमन होता है।

अपची रोग में उपयोग

अपची के रोगी को सहदेवी की मूल को पुष्य नक्षत्र में उखाड़कर प्रभावित भाग पर बांधने की विधि अपनाएं। इससे अपची विकार दूर होता है। 

विसर्प और पामा में राहत

विसर्प या पामा रोग में सहदेवी के पत्तों का स्वरस निकालकर लेप करें। यह लेप जलन को तुरंत नियंत्रित कर लेता है।

ज्वर और नींद संबंधी फायदे

विषम ज्वर में सहदेवी का स्वरस तेल में सिद्ध करके सेवन करें, यह ज्वर नाशक होता है। इसके मूल को सिर पर बांधने से ज्वर उतरता है और गहरी नींद आती है। बुखार में सहदेवी की जड़ को सर पर बांधना चाहिए जिससे ज्वर शीघ्र उतर आता है। ज्वर के उतर आने के उपरान्त इस जड़ को हटा लेना चाहिये। विषमज्वर में इसका क्वाथ पीना चाहिये। 

सहदेवी का परिचय 

सहदेवी का पादप दिखने में साधारण होता है जो की खरपतवार की भाँती ऊगा हुआ होता है, लेकिन आयुर्वेद में इसका औषधीय महत्त्व होता है। सहदेवी का पौधा 15 से 75 सेंटीमीटर ऊंचा होता है, जो जमीन पर फैला हुआ होता है। इसका तना और पट्टियां सफ़ेद रोम से ढका हुआ होता है जो इसे धूसर रंग देता है। सहदेवी का स्वाद तीखा होता है। यह बालू मिटटी में अधिकता से पाया जाता है। 
  • रस – कटु
  • वीर्य – उष्ण
  • गुण – लघु, रुक्ष
  • विपाक – कटु।
  • प्रभाव – ज्वरघ्न 
सहदेवी की पत्ती तुलसी की पत्ती अथवा पोदीना की पत्ती के सादृश्य होती है। पत्तियां छोटी, संकुचित और आगे से तीखी होती हैं, लगभग 2-5 सेंटीमीटर लंबी। ये किनारों से थोड़ी दांतेदार या चिकनी होती हैं, दोनों तरफ सफ़ेद रोम से ढकी हुई होती हैं। इसके फूल छोटे-छोटे गुलाबी-बैंगनी या हल्के बैंगनी रंग के होते हैं, जो सिर-सिराए (कैपिटुलम) में गुच्छों की तरह खिलते हैं। सहदेवी का फूल हलके जामुनी रंग का होता है और ये सूक्ष्म मुण्डकों में होते हैं इसके बीज कालीजीरी के सादृश्य होते हैं। इसके फूल बरसात के मौसम (जुलाई-सितंबर) में अधिक दिखते हैं। जड़ पतली, सफेद-भूरी, लंबी और शाखित होती है। आयुर्वेद में मूल ही सबसे ज्यादा उपयोगी मानी जाती है, जो सिरदर्द या ज्वर में बांधने के काम आती है।

यह पूरे भारत में मैदानी इलाकों, खाली जमीनों, सड़क किनारों, खेतों के आसपास 1200 मीटर ऊंचाई तक उगता है। वर्षा ऋतु में सबसे ज्यादा फैलता है, गर्मी और बरसात में प्रमुखता से दिखता है। इसे ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती है और यह सूखा सहन करने वाला पौधा होता है।

सहदेवी दण्डोत्पला सहदेवा कफापहा।
ज्वरपाचन ब्रुष्या बल्या रूच्या च कफापहा॥
भावप्रकाश निघंटु

​भावप्रकाश निघंटु (पूर्वखंड, गुडूच्यादि वर्ग) में सहदेवी को कफ-वात शामक बताया गया है। सहदेवी, दण्डोत्पला, सहदेवा नाम से जानी जाती है। यह कफ नाशक, ज्वर और पाचन विकार नाशक, ब्रुष्य (शारीरिक विकासकारी), बल्य (ताकत देने वाली), रूचिकारक (भूख बढ़ाने वाली) है।

सहदेवी सहदेवा दण्डोत्पला इत्यपि।
तिक्ता उष्णा लघु रूक्षा कफवातहरा भवेत्॥
​धन्वन्तरि निघंटु

सहदेवी तिक्त रस, उष्ण वीर्य, लघु, रूक्ष गुण वाली है। कफ-वात शामक, वातानुलोमक, निद्राकारक, मूत्रकृच्छ्र, विषम ज्वर और सिद्धम नाशक। विपाक कटु।

श्वेता नीला फलं मूलं सहदेवीति विश्रुता।
वातकफापहा ज्वरघ्ना कासहरा कुष्ठनुत्॥
राज निघंटु

श्वेत या नीले रंग की जड़ सहदेवी कहलाती है। वात-कफ नाशक, ज्वर निवारक, कास (खांसी) हर, कुष्ठ नाशक। रस-तिक्त-कषाय, वीर्य-उष्ण।

श्लोक: (ज्वर चिकित्सा संदर्भ)
सहदेव्याः मूलं मस्तके बद्ध्वा ज्वरं शमयेत्।
चरक संहिता

​सहदेवी की जड़ को सिर पर बांधने से विषम ज्वर उतरता है। 
 
सहदेवी के भाषाओं में नाम 
Sanskrit:
  • सहदेवी
  • दण्डोत्पला
  • सहदेवा
Hindi:
  • सहदेई
  • सहदैया
Kannada:
  • करे हिन्दी (kare hindee)
  • सहदेबी (Sahadebi)
Gujarati:
  • सहदेवी (Sahadevi)
  • सदोरी (Sadori)
  • सदोडी (Sadodi)
  • शेदरडी (Shedradi)
Tamil:
  • नैचिट्टे (Neichettei)
  • मुकूट्टीपुनडू (Mukuttipundu)
  • Telugu:
  • घेरिट्टेकरनिना (Gherittkarnina)
  • गारिटिकम्मा (Garitikamma)
Bengali:
  • कूकसीम (Kuksim)
  • छोट कुकासिमा (Chot kukasima)
  • कालाजीरा (Kala jira)
Punjabi:
  • सहदेवी (Sahadevi)
  • Marathi:
  • सहदेवी (Sahadevi)
  • सायिदेवि (Sayidevi)

Malayalam:

  • पिरिना (Pirina)
  • पूवनकुरुनथल (Puvankuruntal) 
महत्वपूर्ण
  • मात्रा और विधि का पालन सावधानीपूर्वक करें
  • गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं इसका प्रयोग न करें
  • बच्चों और बुजुर्गों के लिए चिकित्सक की सलाह आवश्यक
  • एलर्जी या अन्य चिकित्सा स्थिति होने पर पहले जांच कराएं
  • किसी भी आधुनिक दवा के साथ संयोजन से बचें


सहदेवी के प्रमुख औषधीय उपयोग
सहदेवी आयुर्वेद में बहुगुणी औषधि है। निम्न रोगों में इसका उपयोग किया जाता है:
  • बुखार - मूल को सिर पर बांधने से सामान्य बुखार उतरता है
  • विषम ज्वर - स्वरस तेल ज्वरनाशक, मूल सिर पर बांधें
  • विस्फोट - कल्क को घी में भूनकर बांधने से सूजन-दर्द शांत
  • भूत बाधा - मूल सिद्ध जल से स्नान + धूपन करने से लाभ
  • ग्रह बाधा - बच्चों को मूल सिद्ध जल स्नान + गुग्गुलु धूप
  • प्रदर - 1 ग्राम मूल कल्क बकरी दूध के साथ सेवन
  • श्लीपद - मूल कल्क+हरताल लेप या पत्ती स्वरस तेल लेप
  • शुक्रकर - पारंपरिक उपयोग, वैद्य परामर्श आवश्यक
  • निद्राजनन - मूल को सिरहाने रखने से गहरी नींद आती है
  • नाक से खून गिरना - पत्ती स्वरस या मूल चूर्ण नस्य में उपयोग

यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्य से लिखा गया है। सहदेवी के सभी औषधीय प्रयोग आयुर्वेदिक ग्रंथों और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित हैं। इन्हें घरेलू उपाय के रूप में उपयोग करने से पहले किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक या वैद्य से परामर्श अवश्य लें। यह जानकारी चिकित्सा सलाह नहीं है। greenayurved.in या लेखक चिकित्सकीय परिणामों के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे। स्वयं चिकित्सा करने से पहले डॉक्टर से संपर्क करें।

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