रसौत रसांजन के फायदे उपयोग जानिये

रसौत रसांजन के फायदे उपयोग और सेवन विधि जानिये

रसौत (रसांजन, रसवंती) एक आयुर्वेदिक हर्ब का नाम है जिसके कई औषधीय लाभ होते हैं। रसौत का निर्माण दारुहरिद्रा (बर्बेरिस अरिस्टाटा डीसी बर्बरीकेसी, किल्मोड़ा) से किया जाता है। दारुहरिद्रा हिमालय के क्षेत्रों में उगने वाला औषधीय गुणों से भरपूर पादप है। दारुहरिद्रा का मूल, छाल, पत्तों में में प्राकृतिक रूप से जीवाणुरोधी, एंटीपीरियोडिक, एंटीकैंसर, एंटीपीयरेटिक, एंटीडायबिटिक और डायफोरेटिक गुण होते हैं। 
 
रसौत रसांजन के फायदे उपयोग जानिये

दारूहरिद्रा का अर्क रसौत कहलाता है। इसका उपयोग आयुर्वेद में नेत्र विकार, बवासीर, लिवर विकार, त्वचा विकार और स्त्रियों से सम्बंधित रोगों के  उपचार के लिए किया जाता है। स्वाद में यह कटु/कड़वा होता है और यह एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल और एंटी-ऑक्सीडेंट गुण लिए होता है। रसोत को आप चूर्ण, अर्क या वटी के रूप में प्राप्त कर सकते हैं।  
 
इसके साथ ही यह कामोत्तेजक गुण, मेनोरेजिया, दस्त, पीलिया आदि विकारों में भी लाभकारी होता है जिसका उपयोग नेत्रश्लेष्मलाशोथ, रक्तस्राव बवासीर, अल्सर, पीलिया, बढ़े हुए यकृत और बढ़े हुए प्लीहा आदि विकारों में लाभकारी होता है।

रसौत (रसांजन या रसवंती) के फायदे/लाभ 

रसौत (रसांजन या रसवंती) दारुहरिद्रा (बर्बेरिस आर्टिकुलाटा) के अर्क से बनी आयुर्वेदिक औषधि है, जिसका पारंपरिक उपयोग नेत्र रोगों, बवासीर, त्वचा विकारों और पाचन समस्याओं में होता रहा है। यह कड़वी, शीतल और रक्तशोधक गुणों वाली है, आइये इसके लाभ विस्तार से जान लेते हैं। 
 

नेत्र रोगों में रसोत के फायदे 

कंजंक्टिवाइटिस (नेत्रश्लेष्मलाशोथ) और ऑप्थल्मिया (नेत्रशोथ) में पलकों पर इसका लेप लगाने से लाभ होता है। आंखों की लाली में 250 मिलीग्राम रसौत को 25 मिलीलीटर गुलाबजल में घोलकर एक बूंद आंखों में टपकाएं जिससे सूजन और जलन दूर होती है। यह आंखों की रोशनी सुधारने और संक्रमण से बचाने में भी लाभकारी है। आंखों की खुजली और दर्द कम करने के लिए भी यह लाभकारी है.
 

पीलिया में रसोत का उपयोग 

पीलिया और लीवर विकारों में रसौत शहद के साथ मिलाकर लेने (250-500 मिलीग्राम)। यह यकृत उत्तेजक और विषाक्तता नाशक है, पीलिया के लक्षणों जैसे पीली त्वचा और थकान में राहत देता है। बढ़े हुए यकृत-प्लीहा में भी उपयोगी है ।​​ 

गर्भाशय सूजन में राहत

ल्यूकोरिया (सफेद पानी) और मेनोरेजिया में रसौत गर्भाशय की सूजन कम करता है। दारुहरिद्रा चूर्ण को पुष्यानुग चूर्ण के साथ सममात्रा में 2.5-5 ग्राम प्रतिदिन लें। मासिक धर्म संबंधी विकारों में यह प्रभावी है।​ 
 

मुंह-गले की बीमारियां

रसौत के पानी से गरारे करने से मुंह के अल्सर, गले की खराश और दांत-मसूड़ों के रोगों में लाभ होता है। एंटीबैक्टीरियल गुण संक्रमण रोकते हैं।​ 
 

सूजन-चोट का निवारण

चोट या सूजन पर रसौत का लेप लगाने से दर्द और सूजन तुरंत कम होती है। एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से मांसपेशी दर्द में भी राहत मिलती है।​​ 
 

कब्ज़ दूर करना

कब्ज़ में 1/8 टीस्पून रसौत को 1 कप पानी में घोलकर पिएं। लैक्सेटिव गुण मल को पतला कर बाहर निकालते हैं। क्रॉनिक कब्ज़ में उपयोगी है।​ 
 
कब्ज दूर करने की आयुर्वेदिक ओषधि 

पेशाब में जलन का उपचार

पेशाब में जलन में आंवले पाउडर के साथ रसौत लें। यह मूत्रमार्ग संक्रमण कम करता है और जलन शांत करता है। 
 

रक्तस्राव बवासीर में लाभ

खुनी बवासीर (ब्लीडिंग पाइल्स) में रसौत को पानी में 1:30 अनुपात में गुदा मार्ग को धोएं। यह रक्तस्राव रोकता है और सूजन को कम करता है। रात को सोने से पहले गोली रूप में लेने से 8 दिनों में राहत मिलती है। बवासीर (Piles/Hemorrhoids) में यह उपयोगी है क्योंकि यह एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के कारण घावों को ठीक करने वाले गुणों से युक्त होता है। अधिक लाभ के लिए आप नीचे दी गई ओषधियों को एक साथ मिला कर उपयोग करे तो शीघ्र लाभ मिलता है। 
1- रसौंत 50 ग्राम
2- हरण 50 ग्राम
3- बाकायन बीज 50 ग्राम
4- निंबोली 50 ग्राम
5- नागकेसर 50 ग्राम 

रक्तस्त्राव में उपयोगी

40-100 mg रसौंत को मक्खन (Butter) के साथ मिश्रित रूप में सेवन से रक्तस्त्राव में लाभ मिलता है। 

त्वचा के फटने / त्वचा विकारों में लाभकारी

रसोत का उपयोग त्वचा विकारों में लाभकारी है, त्वचा के फटने, घावों और अल्सर में शहद के साथ रसौत मिश्रित लेप लगाएं। यह व्रणशोधक है और घाव जल्दी भरता है। फोड़े-फुंसी, पिंपल्स में 1 टीस्पून मक्खन में 1/4 चम्मच कपूर और रसौत पाउडर मिलाकर लगाएं।​​ 

रसौत रसांजन के अन्य फायदे

  • रसौत आयुर्वेदिक औषधि है जो त्वचा, पाचन और अन्य रोगों में पारंपरिक रूप से उपयोगी है। इसके एंटी-माइक्रोबियल, रक्तशोधक और पित्त संतुलक गुण कई समस्याओं में राहत देते हैं।​​
  • अल्सर और घाव: रसौत को शहद के साथ मिलाकर पेस्ट बनाएं और प्रभावित जगह पर लगाएं। यह घाव शीघ्र भरता है और संक्रमण रोकता है।
  • मुंहासे और फोड़े-फुंसी: एंटी-माइक्रोबियल गुण बैक्टीरिया नष्ट कर त्वचा साफ करते हैं। मक्खन, कपूर के साथ लेप लगाएं।
  • एक्जिमा: रसौत का लेप सूजन और खुजली कम करता है।​​
  • नागरमोथा और पान के साथ: रसौत को नागरमोथा (नागरमोथा) और पान के पत्तों के साथ मिलाकर त्वचा संक्रमण में लगाएं। यह शीतलता प्रदान करता है।
  • कब्ज: 1/8 चम्मच रसौत 1 कप पानी में घोलकर पिएं। लैक्सेटिव प्रभाव से मल नरम होता है।
  • दस्त और उल्टी: रसौत को कुटज छाल, नागरमोथा, अतीस और लाक्षा के साथ बराबर मात्रा (2-5 ग्राम) में मिलाकर पानी से लें। पेट संक्रमण दूर होता है और दस्त नियंत्रित होता है।
  • कान दर्द और बहाव: रसौत को स्त्री के दूध (मां का दूध) में घिसकर शहद मिलाएं। 1-2 बूंदें कान में डालें। यह घाव ठीक करता और संक्रमण समाप्त करता है। सावधानी से उपयोग करें।

अन्य प्रमुख उपयोग
  • बुखार: रसौत ज्वरनाशक है; शहद के साथ लें।
  • मधुमेह (डायबिटीज): रक्त शर्करा नियंत्रण में सहायक; डॉक्टर सलाह से।
  • जोड़ों का दर्द: लेप या काढ़े से सूजन घटाएं।
  • रक्त शुद्धिकरण: विषाक्त पदार्थ बाहर निकालता है।
  • इम्यूनिटी वृद्धि: नियमित सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। 
  • गले और मुंह के बैक्टीरिया से बचाव-1 गिलास गुनगुना पानी लें और इसमें 1 चम्मच रसौत पाउडर अच्छी तरह घोलें। इस मिश्रण से दिन में 2-3 बार 30-60 सेकंड तक गरारे करें। रसौत के कड़वे और शीतल गुण बैक्टीरिया को मारते हैं, गले की सूजन कम करते हैं तथा मुंह की दुर्गंध दूर भगाते हैं।
  • पिंपल्स से राहत 1 चम्मच मक्खन (बटर) लें और इसमें 1 छोटा कपूर का टुकड़ा तथा 1 चम्मच रसौत पाउडर अच्छी तरह मिलाएं। इस पेस्ट को चेहरे पर प्रभावित पिंपल्स वाली जगह पर लगाएं। 20-30 मिनट बाद हल्के गुनगुने पानी से धो लें। दिन में 1-2 बार उपयोग से पिंपल्स सूख जाते हैं, लाली और दर्द कम होता है।
  • रसौत कान बहने (कर्णस्राव) की समस्या में पारंपरिक आयुर्वेदिक उपाय के रूप में प्रभावी है। इसके एंटीसेप्टिक और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण संक्रमण को कम कर मवाद और बदबू दूर करते हैं।
  • रसौत पाउडर को आंवले के चूर्ण के साथ बराबर मात्रा (1:1, लगभग 1/2 से 1 चम्मच) में मिलाएं। इस मिश्रण को गुनगुने पानी के साथ दिन में 2 बार लें। आंवला की अम्लता और रसौत का शीतल प्रभाव मूत्रमार्ग की सूजन घटाते हैं, जलन शांत होती है और पेशाब सुगम होता है। 
  • मूत्र नली (यूरेथ्रा) के घाव या संक्रमण में रसौत का काढ़ा पिएं। यह आंतरिक घाव भरता है और जलन कम करता है। 

रसोत बनाने की विधि

पारंपरिक तरीके से रसोत (रसौत या रसोत) बर्बेरिस (दारुहल्दी) की जड़ों और तने की छाल से किया जाता है। यह कब्ज़, त्वचा रोगों और पाचन समस्याओं के लिए उपयोगी है। 

स्वस्थ, परिपक्व बर्बेरिस पौधों से जड़ें और तने की छाल एकत्र करें, जो कीटों से मुक्त हों। इन्हें नल के पानी से अच्छी तरह धोकर साफ करें ताकि मिट्टी और अशुद्धियां दूर हो जाएं। ताजी और गुणवत्ता वाली सामग्री ही चयन करें।​

साफ की गई जड़ों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें। इससे उबालने की प्रक्रिया तेज होती है और अर्क समान रूप से निकलता है। कटे टुकड़ों को बर्तन में डालकर उसके सोलह गुना पानी मिलाएं। मंद आंच पर 5-6 घंटे तक धीरे-धीरे उबालें। उबालते समय लगातार हिलाते रहें ताकि अर्क एकसमान गाढ़ा बने। पानी का स्तर कम होने पर थोड़ा और भी मिला सकते हैं।​

उबाल के दौरान अर्क को बार-बार हिलाएं जब तक यह गाढ़ा न हो जाए। अधिक उबालने से गुण नष्ट हो सकते हैं। अर्क को महीन कपड़े या छलनी से छानकर अशुद्धियां हटा दें। शेष गाढ़े अर्क को फिर से 1 घंटे तक उबालें ताकि अतिरिक्त जल वाष्पित हो जाए। ठंडा होने पर अर्क अर्ध-ठोस अवस्था में बदल जाता है, जिसे रसोत कहते हैं। इसे हाथों से गूंथकर छोटे गोले या ग्लोब्यूल्स बना लें। रसोत को ठंडी, अंधेरी और सूखी जगह पर ग्लास जार में रखें। सीधी धूप, गर्मी या नमी से दूर रखें ताकि इसकी शेल्फ लाइफ 1-2 वर्ष बनी रहे, नमी से चिपचिपाहट बढ़ सकती है। 

सन्दर्भ/सोर्स 

​"दारुहरिद्रा तिक्ता कटु कषायाः शीता रूक्षा लघु कफपित्तनुत्।
नेत्ररोगहरा विसर्पकुष्ठापहा कासास्ररोगनुत्॥" 
(भावप्रकाश निघंटु, गुडूच्यादि वर्ग)

दारुहरिद्रा (रसौत का स्रोत) तिक्त, कटु और कषाय रस वाली, शीतल, रूक्ष, लघु है। यह कफ-पित्त को शांत कर नेत्र रोग, विसर्प, कुष्ठ, कास और रक्त विकारों को नष्ट करती है।​

"हरिद्रा तिक्ता कटु तिक्श्णा रूक्षा लघ्वङ्गुष्ठप्रसादनाः।
कुष्ठविसर्पकामिलागदाः कृमिविषविषमज्वराः॥" (चरक संहिता, चिकित्सा स्थान 3/143)

हरिद्रा (रसौत समान गुण) तिक्त, कटु, तीक्ष्ण, रूक्ष, लघु है। यह कुष्ठ, विसर्प, कामिला रोग, कृमि, विष और विषम ज्वर को दूर करती है। नेत्र रोगों में अनुप्रयोग।​

"रसांजनं नेत्रविरोहणं च क्षोभकं रक्तगुल्मं कफापहम्।
त्वक्रोगहरं कासहरं तथा वामनं कुरुते रसः॥" (सुश्रुत संहिता, कल्पस्थान)

रसांजन नेत्र वृद्धि रोधक, रक्तगुल्म नाशक, कफ नाशक, त्वक् रोग हर, कास नाशक और वमनकारी है। नेत्र चिकित्सा में प्रधान।​

"दारुहरिद्रा तिक्ता कषाया शीता विपाके विषमला।
कफपित्तकृतान् रोगान् नेत्रपाकादीन् हन्ति॥" (अष्टांग हृदयम, सूत्र स्थान 15/47)

दारुहरिद्रा तिक्त-कषाय रस वाली, शीत विपाक, विषमाग्नि वाली। कफ-पित्तजन्य रोग जैसे नेत्रपाक आदि नष्ट करती है।​

"रसौषधीनां श्रेष्ठं रसंजनं नेत्ररोगेशु प्रयोक्तव्यम्।
त्वचः शोधनं रक्तस्तम्भनं कृमिनाशनम्॥" (रस रत्न समुच्चय, रसौषधि प्रकरण)

रसौषधियों में श्रेष्ठ रसंजन नेत्र रोगों में प्रयोज्य। त्वचा शोधन, रक्त स्तंभन और कृमि नाश करता है।
 
ये पारंपरिक उपयोग शैक्षिक हैं; चिकित्सकीय सलाह के बिना न अपनाएं। अधिक मात्रा से दस्त या अन्य प्रभाव हो सकते हैं। आयुर्वेदिक डॉक्टर से परामर्श लें। 
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