3 आदतें शरीर को अंदर से कमजोर कर रही हैं

आपकी ये 3 आदतें शरीर को अंदर से कमजोर कर रही हैं, बीमारियों को दावत दे रही हैं

आयुर्वेद में रोगों को सिर्फ बाहर की वजहों से नहीं जोड़ा जाता। चरक संहिता जैसे पुराने ग्रंथों में साफ कहा गया है कि बीमारी की असली जड़ हमारे अपने आचरण, आदतों और गलत फैसलों में छिपी होती है। शरीर बाहर के मौसम, कीटाणु या प्रदूषण से प्रभावित तो होता है, लेकिन ज्यादातर रोग अंदर से पनपते हैं – जब हम जानबूझकर या अनजाने में ऐसी चीजें करते हैं जो प्रकृति के नियमों के खिलाफ जाती हैं।

आपकी ये 3 आदतें शरीर को अंदर से कमजोर कर रही हैं, बीमारियों को दावत दे रही हैं

आयुर्वेद में रोगों की मुख्य तीन जड़ें बताई गई हैं, जिन्हें "त्रिविध रोग हेतु" या "रोग की तीन जड़ें" कहा जाता है। ये हैं – प्रज्ञापराध, अग्निमांद्य (पाचन अग्नि का मंद होना) और दोषों का वैषम्य (वात, पित्त, कफ का असंतुलन)। इनमें से पहली दो जड़ें हमारी रोज़ की आदतों से पैदा होती हैं, और तीसरी इनके असर से आती है। अगर इन जड़ों को समय रहते पहचानकर सुधार लें, तो कई बीमारियां खुद-ब-खुद दूर हो सकती हैं। आइए विस्तार से समझते हैं ये तीनों।

प्रज्ञापराध – बुद्धि का अपराध या जानबूझकर गलत करना

चरक संहिता में लिखा है – "धीधृतिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत्कुरुते अशुभम्। प्रज्ञापराधं तं विद्यात् सर्वदोषप्रकोपणम्।" यानी बुद्धि, धैर्य और स्मृति से भटककर जो अशुभ काम किया जाता है, वही प्रज्ञापराध है। यह सबसे बड़ी जड़ है, क्योंकि यह सब रोगों को जन्म देती है।
यह क्या है? जानते हुए भी गलत आदतें अपनाना। जैसे:

  • भूख न लगने पर भी जबरदस्ती खाना खा लेना।
  • रात को देर तक जागना, जबकि शरीर को रात में आराम चाहिए।
  • थकान होने पर भी काम करते रहना, आराम न करना।
  • रोज़ गुस्सा करना, चिंता में डूबे रहना, तनाव को नजरअंदाज करना।
  • मौसम के हिसाब से कपड़े या खाना न बदलना, जैसे सर्दी में ठंडी चीजें खाना।
  • नींद को हल्के में लेना – कभी जल्दी सोना, कभी देर से।
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ये आदतें सीधे दोषों को भड़काती हैं। आजकल की भागदौड़ वाली जिंदगी में यही प्रज्ञापराध सबसे ज्यादा देखने को मिलता है। लोग जानते हैं कि रात 12 बजे तक मोबाइल चलाना गलत है, लेकिन फिर भी करते हैं। नतीजा? नींद खराब, पाचन बिगड़ता है और शरीर कमजोर पड़ता जाता है।

अग्निमांद्य – पाचन अग्नि का मंद या कमजोर होना

आयुर्वेद कहता है – "रोगाः सर्वेऽपि मन्दाग्नौ" यानी सभी रोग मंद अग्नि से ही होते हैं। अग्नि सिर्फ खाना पचाने वाली आग नहीं, बल्कि शरीर की पूरी ऊर्जा, ओजस और जीवन शक्ति का केंद्र है। जब यह मंद हो जाती है, तो खाना पचने की बजाय सड़ने लगता है, अम (विषाक्त पदार्थ) बनता है और शरीर में जमा होने लगता है।
 

अग्निमांद्य के मुख्य कारण:
  • प्रज्ञापराध से ही – जैसे गलत समय पर खाना, ज्यादा खाना, भारी-तला भुना खाना।
  • अनियमित दिनचर्या – कभी सुबह देर से उठना, कभी रात को भारी भोजन।
  • ज्यादा ठंडी, बासी या प्रोसेस्ड चीजें खाना।
  • भावनात्मक तनाव – गुस्सा या चिंता से अग्नि मंद हो जाती है।

नतीजा? पेट में गैस, कब्ज, अपच, भारीपन, सुस्ती और धीरे-धीरे वजन बढ़ना या कम होना, कमजोरी, त्वचा पर दाग-धब्बे, बार-बार बीमार पड़ना। अम जमा होने से शरीर अंदर से जहरिल हो जाता है, और बीमारियां जैसे डायबिटीज, जोड़ों का दर्द, त्वचा रोग या सांस की समस्या शुरू हो जाती हैं।

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दोषों का वैषम्य – वात, पित्त और कफ का असंतुलन

शरीर में तीन दोष हैं – वात, पित्त और कफ। जब ये संतुलित रहते हैं, तो शरीर स्वस्थ रहता है। लेकिन प्रज्ञापराध और अग्निमांद्य से ये असंतुलित हो जाते हैं।
  • वात बढ़ने से – जोड़ों में दर्द, अनिद्रा, चिंता, कब्ज।
  • पित्त बढ़ने से – जलन, एसिडिटी, गुस्सा, त्वचा पर चकत्ते।
  • कफ बढ़ने से – भारीपन, सुस्ती, बलगम, वजन बढ़ना, सर्दी-खांसी।
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ये असंतुलन से पेट के रोग, सांस की तकलीफ, हड्डी-मांसपेशियों की समस्या और कई क्रॉनिक बीमारियां शुरू हो जाती हैं। हम दवा लेकर लक्षण दबा लेते हैं, लेकिन जड़ वही रहती है – इसलिए बीमारी बार-बार लौट आती है।
इन जड़ों को कैसे खत्म करें?

आयुर्वेद कहता है कि जड़ पकड़ो, तो रोग खुद सूख जाएगा। कुछ आसान कदम:
  • प्रज्ञापराध दूर करें: अपनी आदतों पर नजर रखें। भूख लगे तब खाएं, थकान हो तो आराम करें, रात 10 बजे तक सोने की कोशिश करें।
  • अग्नि मजबूत रखें: सुबह की सैर करें, गुनगुना पानी पिएं, हल्का और गर्म खाना लें, अदरक-हल्दी का इस्तेमाल करें।
  • दोष संतुलित रखें: अपनी प्रकृति (वात-पित्त-कफ) समझें और उसी के अनुसार दिनचर्या अपनाएं। रोज़ थोड़ा व्यायाम, ध्यान और सात्विक भोजन से दोष संतुलित रहते हैं।
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ये सब सामान्य जानकारी है, जो चरक संहिता और अन्य आयुर्वेद ग्रंथों से ली गई है। हर व्यक्ति की प्रकृति और हालत अलग होती है, इसलिए कोई भी बदलाव या नई आदत शुरू करने से पहले अपने वैद्य या डॉक्टर से जरूर सलाह लें। स्वास्थ्य का ख्याल खुद रखें, लेकिन सही मार्गदर्शन के साथ।
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